क्या जिंदा रहना ही हमारा लक्ष्य है…

क्या ज़िंदा रहना ही हमारा लक्ष्य हैं.

हम सुबह जागते हैं। उठते हैं। बिस्तर पर चाय मांगते हैं।जो अकेले हैं,वह खुद चाय बनाते हैं। ऑफिस और काम पर निकलते हैं।दिन भर का वहीं बोर करने वाली दिनचर्या पालन करते हैं।

क्यों नहीं हम अपनी ज़िंदगी में कुछ नया नहीं कर पाते।ऐसा इसलिए की हम भी यह मान बैठें हैं कि बस ऐसा ही चलता हैं और ऐसे ही कट जाएगा ।मगर कभी आप ने कुछ नया करने का प्रयास किया हैं,नहीं ना ।अरे भाई करे भी तो किसके लिए और मेरे पास समय भी तो नहीं हैं।रात को देर से ऑफ़िस से आना और ऑफ़िस जाने के लिए जल्दी उठ जाना ।इस उहाँ पोह की स्थिति में कुछ भी नहीं बचा ।तो तो फिर ज़िंदगी राम नाम सत्य हैं।हमारे ब्लॉग का पता भी यहीं हैं।

ज़िंदगी में कुछ नया ट्राई करे नहीं तो राम नाम सत्य हैं।क्या करे ? मैं भी यही सोच रहा था कि क्या करे ?

यदि आप ने कुछ नया सोचने का प्रयास ही किया तो यह प्रथम स्टेज आप ने पास कर लिया।आख़िर आप ने कुछ नया करने का सोचा तों ।

आप सिर्फ़ सोचिए और मुझे बताए कि अच्छा व बुरा आपने क्या सोचा ? या सोचने के बाद भी केवल ऑफ़िस और घर ही याद आया ?

ज़रा सोचिये ?

मैं अगले ब्लॉग में बताऊँगा कि मैंने क्या सोचा ?आशा है कि आप भी मुझे बताएँगे ।धन्यवाद ।

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